Veda

वेद – विभाग

1. स्वामी श्रद्धानन्द ने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविधालय के स्थापना काल (02 मार्च, 1902) से ही वेद विभाग के माध्यम से स्वतन्त्र रूप में वैदिक ग्रन्थों के पठन-पाठन की व्यवस्था की थी। इसके प्रथम उपाध्याय जगत विख्यात संस्—त के ऐतिहासिक उपन्यासकार पं0 अमिबकादत्त व्यास के शिष्य पं0 शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ थे जिन्होेंने ‘वैदिक इतिहासार्थ निर्णय आदि अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की थी। जगत प्रसिद्ध अन्य वैदिक विद्वानों ने भी इस विभाग में अध्यापन किया है, जिनमें कुछ इस प्रकार हैं जैसे – पं0 नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ ,पं0 विश्वनाथ विधालंकार, चन्द्रमणि विधालंकार, भगवददत्त वेदालंकार, पं0 धर्मदेव विधामार्तण्ड, पं0 प्रियव्रत वेदवाचस्पति , पं0 रामप्रसाद वेदालंकार, डा0 सत्यव्रत राजेश, डा0 भारतभूषण विधालंकार, स्वामी ब्रह्रामुनि आदि। 1963 में डीम्ड विश्वविधालय का दर्जा प्राप्त होने पर भी यह महत्त्वपूर्ण विभाग है। पूरी दुनिया में यही एकमात्र ऐसा विभाग है जिसमें स्वामी दयानन्द सरस्वती की मान्यताओं के अनुसार पूर्ण रूप से वेदों का पठन-पाठन होता है, अन्यत्र नहीं। विभाग में अनुसंधान कराते समय यह ध्यान रखा जाता है कि वर्तमान में वैदिक ज्ञान की क्या प्रासंगिकतासमसामयिकता है। छात्रों को आधुनिकता से जोड़ते हुए वेदों का अध्ययन-अध्यापन एवं अनुसंधान किया जाता है। वेदों के अर्थों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
2. प्रथम विभागाध्यक्ष वेदों के विख्यात विद्वान तथा व्याख्याता पंणिडत प्रियव्रत वेदवाचस्पति ने अनेक मौलिक ग्रन्थों की रचना के साथ सम्पूर्ण वैदिक वा³मय का आलोडन विलोडन कर तीन भागों में, हजारों पृष्ठों में ‘वेदों के राजनीतिक सिद्धान्त बृहद ग्रन्थ का निर्माण किया जिसका विमोचन भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इनिदरागान्धी ने किया था। भारत की राजनीति की दशा और दिशा कैसी हो? वेदों के आधार पर दुनिया के सामने इस बात को व्यवसिथत रूप में व्यापक समीक्षण के बाद सबसे प्रथम आचार्य प्रियव्रत जी ने रखा।
3. इस विभाग को यह सौभाग्य प्राप्त है कि इसके पंणिडत प्रियव्रत जी और पंणिडत रामप्रसाद वेदालंकार अपनी विशेष योग्यता, प्रशासनिक अनुभव और वरिष्ठता के आधार पर गुरुकुल कांगड़ी विश्वविधालय के कुलपति, आचार्य एवं उपकुलपति आदि महत्त्वपूर्ण पदों पर लम्बेकाल तक विराजमान रहे।
4. वेद विभाग में अतीव महत्त्वपूर्ण और उच्चकोटि का अनुसंधान कार्य हुआ है। ऐसा शोध कार्य अन्यत्र देखने में नहीं आता। शताधिक शोधार्थियों ने अब तक पीएच0डी0 शोधोपाधि प्राप्त की है। विश्वविधालय के प्राच्य विधा संकाय में यह विभाग ही ऐसा है जिसने अब तक 04 डंरवत और 01 डपदवत तमेमंतबी च्तवरमबज पूरे किये हैं जो कि वैदिक वां³मय के विविध पक्षों पर आधारित हैं। वैदिक एटीमोलोजी, वैदिक अलंकार और वैदिक यज्ञ को आधार बनाकर किये गये उक्त कार्यों का भारतवर्ष के लिए ही नहीं अपितु विश्व के लिए महत्त्वपूर्ण अवदान है। यज्ञ के वैज्ञानिक पक्ष को लेकर अनुसंधान करने में यह विभाग अपने आदिकाल से ही —त संकल्प है। वैदिक कर्मकाण्ड के वैज्ञानिक अध्ययन (ैबपदजपपिब ैजनकल) के लिए विभाग के अन्तर्गत एक वैदिक संग्रहालय एवं प्रयोगशाला स्थापित की गयी है। इसमें ब्राह्राणग्रन्थों और सूत्र ग्रन्थों में निर्दिष्ट सभी प्रकार के यज्ञीय पात्रों का संग्रह किया गया है। अनेक प्रकार के हवनकुण्ड, अनेक प्रकार की जड़ीबूटियाँ तथा अनेकों तत्सम्बन्धी पुस्तकों का संकलन भी किया गया है। पौर्णमास यज्ञ का टमकपव बेेंंजम भी तैयार की गयी सामगान की ब्क् भी तैयार की गयी है। षोडश संस्कारों के अतिरिक्त दर्शेषिट, पौर्णमासेषिट आदि श्रौतयज्ञों का ज्ञान कराया जाता है। विभाग के डा0 दिनेशचन्द्र शास्त्री ने यज्ञ सामग्री पर आधारित एक डपदवत तमेमंतबी चतवरमबज लेकर के यज्ञ एवं उसकी सामग्री की वैज्ञानिकता को विश्वविधालय के विज्ञान संकाय के प्राध्यापकों के साथ मिलकर प्रयोगों के आधार पर सिद्ध किया है। भविष्य में अतिवृषिट और अनावृषिट आदि को आधार बनाकर विभाग द्वारा प्रयोग करने की योजना है जोकि भारत जैसे गरीब देश के लिए बहुत लाभदायी होगा। समाज में कन्याभ्रूण हत्या का समाधान भी विभाग संस्कारों के माध्यम से करने की योजना रखता है। विभागीय उपाध्यायों ने अब तक वेद, वेदांगों, उपांगों, आरण्यकाें, ब्राह्राणग्रन्थों एवं यज्ञ से सम्बनिधत अनेकों पुस्तकों की रचना की है जिनसे पूरी दुनिया अपने-अपने अनुसार लाभ प्राप्त कर रही है। इस विभाग के पं0 भगवददत्त वेदालंकार ने वैदिक शोध को एक नवीन आयाम दिया है। उन्होंने वैदिक स्वप्नविज्ञान और ऋभु, विष्णु, सविता, बृहस्पति और रुद्र आदि वैदिक देवों का वैज्ञानिक दृषिट से अनुसंधान कर ग्रन्थ लिखे हैं।
5. इस विभाग के उपाध्यायों ने विदेशों की यात्रा कर अपने सारस्वत ज्ञान से विदेशीय लोगों को भी लाभानिवत किया है। आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति, आचार्य रामप्रसाद वेदालंकार, आचार्य सत्यव्रत राजेश, डा0 भारतभूषण विधालंकार एवं डा0 रूपकिशोर शास्त्री, डा0 मनुदेव बन्धु ने समय-समय पर अमेरिका, हालैण्ड, त्रिनिदाद, टोबेको, इण्डोनेशिया, जर्मनी, बेलिजयम, नेपाल और थार्इलैण्ड आदि देशों की यात्रा की एवं वहाँ आयोजित तत्तत सम्मेलनों में जहाँ अध्यक्षता की वहीं रिसोर्स पर्सन के रूप में ज्ञमल दवजम ।ककतमेे भी दिये। वर्तमान में विभाग के प्रोफेसर डा0 रूपकिशोर शास्त्री केन्द्र सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के वेद विधाओं के लिए समर्पित महत्त्वपूर्ण प्रकल्प गुरु सान्दीपनि वेद विधा प्रतिष्ठान, उज्जैन के सचिव नियुक्त हुए हैं । विभागीय प्राध्यापकों ने जहाँ विदेशों में अपनी योग्यता का लोहा मनवाया वहीं अपने देश में भी सैकड़ों वेद सम्बन्धी सम्मेलनों में शोध पत्रों का वाचन किया। विभागीय प्राध्यापकों ने अनेकों पुरस्कार भी प्राप्त किये हैं जिनमें व्यास पुरस्कार, सायण पुरस्कार, पाणिनी पुरस्कार आदि प्रमुख हैं।
6. विभागीय उपाध्याय कर्इ प्दजमतदंजपवदंस तमेमंतबीेवबपमजपमे के भी सदस्य हैं जिनमें वतसक ।ेेवबपंजपवद व टिमकपब ैजनकपमे ।उमतपबं और ।सस प्दकपं व्तपमदजंस ब्वदमितमदबम भंडारकर ओरियण्टल रिसर्च इंस्टीटयूट पूना मुख्य हैं।
7. अनेक एतददेशीय एवं विदेशीय छात्रों का शोधकार्य वैज्ञानिक चिन्तनपरक है जिनमें से कतिपय का उल्लेख इस प्रकार है –
1. सूर्य : वैदिक एवं बालिसाहित्य में – एक तुलनात्मक अध्ययन
शोधार्थी – तितियमादमे, इण्डोनेशिया
2. वैदिक वनस्पतियाँ : एक समीक्षात्मक अध्ययन
शोधार्थी – अशोक कुमार शर्मा
3. आयुर्वेदीय दृषिट से यज्ञ का महत्त्व
शोधार्थी – शालिनी त्रिपाठी
4. वेदों में मानववाद
शोधार्थी – दिलीप वेदालंकार, अमेरिका
5. स्वामी दयानन्द की बृहत्त्रयी
शोधार्थी – सतीश प्रकाश , अमेरिका
6. महर्षि दयानन्द वेदभाष्य में प्रतिपादित त्रैतवाद का समीक्षात्मक अध्ययन
शोधार्थी- सुनील चतुआ ,मारीशस
7. महर्षि दयानन्द वेदभाष्य के परिप्रेक्ष्य में अगिन देवता का अध्ययन
शोधार्थी- सुमेधा आचार्या
8. महर्षि दयानन्द वेदभाष्य के परिप्रेक्ष्य में इन्द्र देवता का अध्ययन
शोधार्थी- कामजित आचार्या

उपयर्ुक्त के अतिरिक्त विभाग के अन्य छात्र भी वर्तमान में वेदों के वैज्ञानिक पक्षों को आधार बनाकर शोधकार्य में संलग्न। यहाँ विभाग में अनुसंधान का माध्यम संस्—त, हिन्दी और अंग्रेजी भाषायें हैं।

8. विभाग ने सत्र 2001-2002 और 2002-2003 में दो पुनश्चर्या पाठयक्रमों का आयोजन किया जिनके संयोजक डा0 भारतभूषण विधालंकार थे।
9. विभाग में अनेकों विदेशी छात्र ज्ञानार्जन कर अपने-अपने स्थानों पर महत्त्वपर्ण कार्य कर रहे हैं। जिनमें डा0 सतीश प्रकाश न्यूयार्क में, डा0 आनन्द विरजा हालैण्ड में, डा0 सुनील चतुआ मौरिसस में और डा0 तितियमादमे इण्डोनेशिया में एवं राधेश कुमार फीजी में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि डीम्ड यूनीवर्सिटी का दर्जा मिलने के बाद इस विभाग के पहले छात्र श्री सोवरन सिंह, मोरिसस के ही थे।
10. विभाग में 27-30 जनवरी 2005 में एक बृहद इन्टरनेशनल वैदिक कान्फ्रेन्स ‘वेदों की विश्व को देन विषय पर सफलतापूर्वक आयोजित की गयी। जिसमें देश विदेश के 700 विद्वानों ने भाग लिया। लगभग 672 शोधपत्र पढ़े गये। इस कान्फ्रेन्स के माध्यम से वेदों में वर्णित सभी विधाओं पर तथा भाष्यकारों पर विचार मन्थन हुआ। वर्तमान सन्दर्भ से वेद विधा को जोड़ने का प्रयास किया गया।
11. इस विभाग के कर्इ उपाध्याय जहाँ भ्पहीसल फनंसपपिमक अर्थात डी0 लिट उपाधिधारी हैं। वहींं विश्वविधालय के प्रशासनिक कायोर्ं में भी समय-समय पर हाथ बंटाते रहते हैं।
12. विभाग में सभी उपाध्यायों को ब्वउचनजमतए स्मचजवच की सुविधा प्राप्त है। छात्रहित एवं शोधकार्य में प्दजमतदमज का उपयोग भी किया जाता है।
13. डण् च्ीपसण् पाठयक्रम प्रारम्भ करने हेतु प्रस्ताव भेजा गया है।
14. शोध कार्य को आगे बढ़ाने के लिए विभागीय पुस्तकालय का कार्य निरन्तर प्रगति पर है।
15. वैदिक अलंकार कोष ,आथर्वणिक पुनरुकित व्याख्याकोष और वैदिक उपमा व्याख्याकोष इन तीन विषयों पर डा0 दिनेशचन्द्र शास्त्री द्वारा स्वतंत्ररूप से कार्य प्रगति पर है इनमें से प्रथम विषय को न्ळब् डंरवत तमेमंतबी चतवरमबज के लिए भेजा जा रहा है।
16. भारतीय धर्म, दर्शन, संस्—ति और संस्कार आदि से सम्बनिधत छात्रों में ब्वउउनदपबंजपवद ैापसस बढ़ाने के लिए समय-समय पर इनको प्रेरित किया जाता है।
17. विभाग में छात्रों को छात्रवृत्ति देने के लिए 15,00,000 और 1,50,000- रु0 के दो कोश सिथर निधि के रूप में स्थापित किये गये हैं जिनके ब्याज से वेद पढ़ने वाले योग्य विधार्थियों को छात्रवृत्ति दी जाती है।
18. विभाग के उपाध्याय विश्वविधालय से प्रकाशित होने वाली इन्टरनेशनल रिसर्च जर्नल गुरुकुल पत्रिका प्ैैछ 0976.8017 के सम्पादन में भी सहयोग कर रहे हैं।
19. विभाग से एक वैदिकवाग ज्योति: प्ैैछ 2277.4351 नामक षाण मासिक मूल्यांकित शोध जर्नल प्रकाशित किया जाता है।

विभाग के प्रस्तावित कार्य

1द्ध आज के युग में प्दजमतदमज का बड़ा महत्त्व है। स्वामी दयानन्द के लेखन का परिमाण लगभग बीस हजार पफुल स्केप आकार के पृष्ठों वाला है। विश्व में इस कार्य की प्दजमतदमज के माèयम से उपलब्ध्ता अत्यन्त आवश्यक है। मेरी जानकारी में महर्षि दयानन्द का उक्त Ñतित्त्व अभी तक इन्टरनेट पर उपलब्ध् नहीं है।
2द्ध प्राचीन काल में विभिन्न रोगों का उपचार औषधियुक्त सामग्री पर आधरित था। इसकी महत्ता को आध्ुनिक युग में स्वामी दयानन्द ने समझा था, जिसका उल्लेख उनके साहित्य में स्थान- स्थान पर मिलता है। अत: उनकी दृषिट को आधर बनाकर उनके विचारों को आध्ुनिक विज्ञान की रसायन, वनस्पति, चिकित्सा आदि शाखाओं के परिप्रेक्ष्य में व्यावहारिक शोध् कर पल्लवित और पुषिपत करने की आवश्यकता है। इस पर कुछ कार्य हमने अन्य विद्वानों के सहयोग से किया भी है जो कि टमकपब ल्ंरदं ज्ीमतंचल के नाम से प्रकाशित है।
3द्ध समस्त वैदिक देवों के दयानन्दÑत विविध् अर्थों के लिए प्रमाण संग्रह कर एक ”वैदिक देवशास्त्रा का उपयोगी ग्रन्थ तैयार करना अत्यन्त उपयोगी कार्य है, क्योंकि स्वामी जी ने स्वयं भी अपने अर्थ के लिए प्रमाण दे दिये हैं। अधिकांश प्रमाण वेदों, ब्राह्राण ग्रन्थों, आरण्यकों से मिल सकते हैं। इससे मैक्डानल के श्टमकपब डलजीवसवहलश् की जहां समीक्षा होगी वहीं वैदिक देवों का सही स्वरूप भी विद्वज्जगत के सामने आयेगा।
4द्ध दयानन्दभाष्य को आधर बनाकर एक ऐसा संग्रह प्रकाशित करना अत्यन्त आवश्यक है जिसमें Íषिभाष्य के कुछ सरल सूक्त, सूक्तांश, अèयाय, अèयायांश संकलित होंगे, जिनमें दूरान्वय, व्यत्यय बाहुल्य आदि की कठिनार्इ न हो एवं उनके संस्Ñत पदार्थ अन्वय क्रम से देकर जहाँ के प्रारम्भ में हिन्दी भाषा को सुधर कर आवश्यक टिप्पणियाँ भी दी गर्इ हैं, वहीं संकलन के प्रारम्भ में दयानन्द भाष्य शैली की विशेषता पर विस्तृत भूमिका भी हो। यह कार्य पीटर्सन आदि के टमकपब ब्वससमबजपवद का सही विकल्प सि( होगा। विदित हो कि अभी तक ऐसा कार्य नहीं हुआ है, जिस कारण भारतवर्ष के विश्वविधालयों में दयानन्दभाष्य का पठन-पाठन नहीं हो रहा है।
5द्ध विदेशी विद्वानों के वेद के अनुवादों में दी गयी पाद-टिप्पणियाँ तुलनात्मक दृषिट से बड़े काम की हैं, जिन पर कार्य करना अपेक्षित है।
6द्ध दयानन्द के ग्रन्थों में जो महत्त्वपूर्ण विषय आये हैं, उन पर विस्तृत लेखन कार्य की अपेक्षा है। जिसे ‘दयानन्द के ग्रन्थों पर भाष्य की संज्ञा दी जा सकती है। विशेषकर सत्यार्थप्रकाश तथा Íग्वेदादिभाष्यभूमिका पर ऐसे भाष्य अपेक्षित हैं। ‘वेदानितèवान्त निवारण जैसी छोटी-छोटी पुसितकाओं का भी अपना महत्त्व है और उनके विषय को लेकर भी शोध् ग्रन्थ लिखे जाने आवश्यक हैं।
7द्ध ‘दयानन्द विचार कोष के अन्तर्गत शिक्षा, राजनीति और कला-कौशल के सम्बन्ध् में स्वामी दयानन्द के विश्लेषणात्मक विचारों का दयानन्द शोध्पीठ पंजाब विश्वविधालय, चण्डीगढ़ से जो कार्य हुआ है, उससे आगे दयानन्द के अन्य विचारों पर भी कार्य किया जाना जरूरी है।
8द्ध ‘चतुर्वेदीयम ग्रन्थमाला के अन्तर्गत Íग्वेदीयम, यजुर्वेदीयम आदि नामों से प्रत्येक वेद की संहिता ;दयानन्द, सायण, गि्रपिफथ आदि के भाष्यों से युक्तद्ध, ब्राह्राण, आरण्यक, उपनिषद, प्रातिशाख्य, सम्बनिध्त सूत्रा साहित्य आदि का समय-समय पर किये गये भाष्यों सहित एक साथ सम्पादन किया जाना बहुत आवश्यक है। यह कर्इ भागों में प्रकाशित होगा। बहुत पहले अलग- अलग स्थानों से इनका प्रकाशन हुआ था जो कि अब मिलता नहीं है। इनमें बहुत सी न्यूनताएँ थीं और ये सभी एक साथ न होकर अलग-अलग थे।

(Since - 2005)

Exclusive Online Partner IndiaResults.com